मध्य पूर्व विश्लेषण: ईरान, इस्लामी क्रांति और अमेरिका-इज़राइल युद्ध की जड़ें
ईरान की इस्लामी क्रांति से लेकर 2026 के अमेरिका-इज़राइल-ईरान युद्ध तक की ऐतिहासिक पड़ताल: साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और वर्चस्व की लड़ाई कैसे बदलती रही।
स्रोत: thepaper.cn
2026 में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच छिड़ा संघर्ष कोई अचानक हुई घटना नहीं है। इसकी जड़ें दो हजार वर्ष से अधिक पुरानी साम्राज्यवादी टकरावों, औपनिवेशिक हस्तक्षेपों और शीत युद्ध की भू-राजनीति में छिपी हैं। ईरान की कहानी उस गौरव और अपमान दोनों की कहानी है, जिसने उसे आज दुनिया की सबसे जटिल भू-राजनीतिक गांठ बना दिया है। यह समझना जरूरी है कि तेहरान और वाशिंगटन के बीच की खाई केवल परमाणु समझौते या प्रतिबंधों की नहीं, बल्कि इतिहास की है।

मुख्य बातें
- प्राचीन गौरव और आधुनिक अपमान: फारसी साम्राज्य की भव्यता ईरानी राष्ट्रीय गर्व का आधार है, लेकिन 19वीं-20वीं सदी के यूरोपीय उपनिवेशवाद ने गहरा राष्ट्रीय अपमान छोड़ा। यही दोहरापन ईरान की विदेश नीति की भावनात्मक ऊर्जा है।
- 1953 का तख्तापलट: अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और ईरानी शाह के गठजोड़ ने प्रधानमंत्री मोसाद्देक की तेल-राष्ट्रीयकरण वाली सरकार को गिरा दिया। यह घटना आज भी ईरानी जनता के अमेरिका-विरोध का सबसे बड़ा प्रतीक बनी हुई है।
- शीत युद्ध में पश्चिमी निर्भरता: 1947 से 1959 तक सैन्य संधियों, सहायता और तेल समझौतों के जरिए ईरान अमेरिकी खेमे से बुरी तरह बंध गया। अमेरिकी सलाहकारों और नागरिकों की भारी मौजूदगी ने ईरानी समाज में आक्रोश भर दिया।
- "श्वेत क्रांति" का विरोधाभास: शाह ने अमेरिकी दबाव में पश्चिमी ढंग की आधुनिकता और भूमि सुधार थोपे। इससे ग्रामीण ढांचा टूटा, किसान शहरों में उमड़े और धार्मिक वर्ग भड़क उठा — समाज दो खेमों में बंट गया।
- 1979 की इस्लामी क्रांति: खोमैनी ने "न पूर्व, न पश्चिम, केवल इस्लाम" का नारा देकर शीत युद्ध के ढांचे को तोड़ने की कोशिश की। इसने ईरान को नया रूप दिया, पर "क्रांति निर्यात" की नीति से उसे अंतरराष्ट्रीय अलगाव भी मिला।
- ईरान-इज़राइल की दुश्मनी: एक समय सहयोगी रहे ईरान और इज़राइल 1979 के बाद धीरे-धीरे आमने-सामने आ गए। हमास, हिजबुल्लाह जैसे समूहों का समर्थन कर ईरान फिलिस्तीन मुद्दे से जुड़ गया और इज़राइल के लिए सीधी चुनौती बन गया।
- अमेरिकी वर्चस्व का क्षरण: 1991 से 2008 के बीच खाड़ी युद्ध, अफगानिस्तान और इराक युद्धों ने अमेरिकी ताकत घटाई, जबकि ईरान को क्षेत्रीय विस्तार का मौका मिला। ट्रंप की "अधिकतम दबाव" नीति और परमाणु समझौते से बाहर निकलना इसी तनाव का परिणाम था।
- "छठा मध्य पूर्व युद्ध": 2023 के गाजा संघर्ष के बाद इज़राइल और अमेरिका ने "प्रतिरोध मोर्चे" और सीधे ईरान पर हमले तेज किए। विश्लेषक इसे फिलिस्तीन, इज़राइल-ईरान और अमेरिका-ईरान तीनों टकरावों का संगम मानते हैं।
गहन विश्लेषण
ईरान की स्थिति एक बुनियादी विरोधाभास में फंसी हुई है, जिसे खोमैनी की विरासत से अलग नहीं किया जा सकता। एक ओर ईरान वेस्टफेलियाई व्यवस्था का राष्ट्र-राज्य है, जिसके अपने राष्ट्रीय हित और तर्क हैं; दूसरी ओर वह एक धर्मशासित "इस्लामी राज्य" है, जो क्रांति निर्यात कर वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को ही बदलना चाहता है। यही दोहरापन उसकी कूटनीति की सबसे बड़ी कमजोरी है — वह जिस व्यवस्था में बचना चाहता है, उसी को उखाड़ने की कोशिश भी करता है।
अमेरिका के लिए ईरान कभी केवल एक देश नहीं, बल्कि उसकी पूरी मध्य पूर्व रणनीति का परीक्षण-पत्थर रहा है। वाशिंगटन ने परमाणु मुद्दा, मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों को ईरान पर दबाव डालने के औजार बनाया, लेकिन हर बार सिक्के का दूसरा पहलू सामने आया — ईरान को जितना दबाया गया, उतना ही वह प्रतिरोध के नए रास्ते खोजता गया। इराक और अफगानिस्तान के युद्धों ने ईरान के पड़ोस में शक्ति-शून्यता पैदा की, जिसे तेहरान ने भरपूर भरा। यह अमेरिकी रणनीति की सबसे बड़ी विडंबना है: उसके ही हमलों ने ईरान के प्रभाव का रास्ता खोल दिया।
इज़राइल का कारक इस समीकरण को और जटिल बनाता है। अरब-इज़राइल टकराव के धीरे-धीरे फिलिस्तीन-इज़राइल और फिर ईरान-इज़राइल टकराव में बदलने से ईरान इस्लामी दुनिया में इज़राइल-विरोध का केंद्रीय चेहरा बन गया। "अब्राहम समझौते" के जरिए अरब देशों के साथ इज़राइल के संबंध सामान्य होने से ईरान और भी अलग-थलग महसूस करने लगा, और उसने अपनी सुरक्षा "प्रतिरोध मोर्चे" में तलाशी। इससे इज़राइल को अमेरिका को अपने साथ लाने का आधार मिला।
आगे का रास्ता साफ नहीं है। अमेरिका न तो पूर्ण युद्ध चाहता है, क्योंकि इससे उसका वैश्विक वर्चस्व और कमजोर होगा, और न ही सीमित हमले ईरान को झुका पाते हैं। यही "युद्ध और शांति के बीच फंसी" स्थिति आने वाले वर्षों में मध्य पूर्व की अस्थिरता का केंद्रीय स्रोत बनी रहेगी। भारत जैसे देशों के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्ग और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं इसी क्षेत्र से जुड़ी हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या 2026 का अमेरिका-इज़राइल-ईरान युद्ध केवल परमाणु कार्यक्रम के कारण हुआ? नहीं। परमाणु मुद्दा एक तात्कालिक कारण है, लेकिन असली जड़ें 1953 के तख्तापलट, 1979 की क्रांति और शीत युद्ध के बाद की वर्चस्व-राजनीति में हैं। यह संघर्ष विचारधारा, तेल, क्षेत्रीय प्रभाव और ऐतिहासिक अविश्वास का मिश्रण है।
ईरान और इज़राइल एक समय सहयोगी कैसे थे? शाह के शासनकाल में दोनों अमेरिकी खेमे के सहयोगी थे और साझा सुरक्षा हितों से जुड़े थे। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान की विचारधारा में इज़राइल-विरोध शामिल हो गया, और धीरे-धीरे दोनों पूर्ण शत्रु बन गए।
इस संघर्ष का भारत पर क्या असर पड़ सकता है? भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के बड़े हिस्से के लिए खाड़ी पर निर्भर है, और लाखों भारतीय वहां काम करते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तनाव से तेल कीमतें और आपूर्ति शृंखलाएं प्रभावित हो सकती हैं, इसलिए भारत के लिए यह क्षेत्र सीधे आर्थिक हित का विषय है।
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