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पुतिन का G20 शिखर सम्मेलन: क्या रूसी राष्ट्रपति शामिल होंगे?

क्रेमलिन ने कहा है कि पुतिन की G20 भागीदारी अभी तय नहीं है, जबकि ज़ेलेंस्की से मुलाकात का न्योता अब भी मॉस्को में खुला है।

स्रोत: thepaper.cn

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच एक बार फिर कूटनीतिक अटकलों का दौर शुरू हो गया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने साफ कहा है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की G20 शिखर सम्मेलन में भागीदारी अभी तय नहीं हुई है। यह बयान ऐसे समय आया है जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने इसी मंच पर पुतिन से मिलने की इच्छा जताई थी। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ कूटनीतिक बयानबाजी है या वाकई किसी बातचीत की जमीन तैयार हो रही है।

रूसी राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन का प्रतीकात्मक दृश्य

मुख्य बातें

  • भागीदारी पर अनिश्चितता: पेस्कोव के मुताबिक पुतिन की G20 यात्रा को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। यह अनिश्चितता खुद रूस की ओर से आई है, किसी बाहरी दबाव का नतीजा नहीं।
  • ज़ेलेंस्की को न्योता: पेस्कोव ने कहा कि अगर ज़ेलेंस्की पुतिन से मिलना चाहते हैं तो वे मॉस्को आ सकते हैं। यह न्योता पहले दिया गया था और अब भी "वैध" बताया गया है।
  • यूरोप पर निशाना: रूसी अखबार इज़वेस्तिया से बात करते हुए पेस्कोव ने आरोप लगाया कि यूरोप ने यूक्रेन मुद्दे पर बातचीत आगे बढ़ाने के लिए कोई ठोस प्रस्ताव नहीं दिया।
  • बातचीत की शर्त: पेस्कोव की दलील थी कि जिसे बातचीत करनी होती है वह खुद पहल करता है, लेकिन यूरोप ऐसा नहीं कर रहा। यानी जिम्मेदारी यूरोपीय देशों पर डाली गई।
  • समय का संकेत: यह बयान 12 सितंबर को सामने आया, जबकि खबर 13 सितंबर को प्रकाशित हुई। इससे साफ है कि यह मामला अभी सक्रिय कूटनीति के दायरे में है।
  • G20 का महत्व: G20 दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं का मंच है, जहां रूस और पश्चिम दोनों मौजूद रहते हैं। ऐसे में पुतिन की उपस्थिति या अनुपस्थिति दोनों ही बड़ा राजनीतिक संदेश देती है।
  • जंग का संदर्भ: यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में है जब यूक्रेन में जंग जारी है और शांति वार्ता की कोई ठोस प्रगति नहीं दिख रही।

गहन विश्लेषण

पेस्कोव का बयान सतही तौर पर एक साधारण प्रशासनिक जवाब लगता है, लेकिन इसकी राजनीतिक बुनावट कहीं ज्यादा गहरी है। रूस ने जानबूझकर भागीदारी को "अनिश्चित" रखा है, ताकि वह बातचीत की गति और एजेंडा दोनों पर नियंत्रण बनाए रख सके। अगर पुतिन पहले ही हामी भर देते, तो पश्चिम को यह कहने का मौका मिल जाता कि रूस बातचीत के लिए उत्सुक है। अनिश्चितता बनाए रखकर मॉस्को दबाव की राजनीति खेल रहा है।

दूसरी बात, "मॉस्को आओ" वाला न्योता कोई नई पेशकश नहीं है। यह पहले से चली आ रही रूसी स्थिति है, जिसे अब दोहराया गया है। इसका मकसद यह दिखाना है कि गतिरोध की जिम्मेदारी यूक्रेन और उसके पश्चिमी सहयोगियों पर है, रूस पर नहीं। यह प्रचार-रणनीति का हिस्सा है, जिसमें रूस खुद को "बातचीत के लिए तैयार" पक्ष के रूप में पेश करता है।

तीसरी और सबसे अहम बात यूरोप पर लगाया गया आरोप है। पेस्कोव ने कहा कि यूरोप ने कोई पहल नहीं की। यह संकेत है कि रूस यूरोप को अलग-अलग खेमों में बांटकर देखना चाहता है, खासकर जब अमेरिका की भूमिका को लेकर यूरोपीय देशों में मतभेद हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि G20 की मेजबानी और एजेंडा वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं को भी तय करते हैं।

आगे की संभावना देखें तो तीन रास्ते दिखते हैं। पहला, पुतिन G20 में शामिल हों और कोई सीमित संवाद हो। दूसरा, वे न आएं और रूस अनुपस्थिति को भी एक राजनीतिक बयान बना दे। तीसरा, पूरा मामला अटकलों तक सीमित रहे। फिलहाल संकेत यही है कि मॉस्को जल्दबाजी में नहीं है और वह समय अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या पुतिन G20 में जाएंगे या नहीं? क्रेमलिन के मुताबिक यह फैसला अभी नहीं हुआ है। पेस्कोव ने साफ कहा कि भागीदारी पर कोई अंतिम पुष्टि नहीं है, इसलिए किसी भी तरह के दावे को अटकल माना जाना चाहिए।

क्या ज़ेलेंस्की और पुतिन की मुलाकात हो सकती है? रूस का रुख है कि अगर ज़ेलेंस्की मिलना चाहते हैं तो मॉस्को आ सकते हैं। यूक्रेन की ओर से इस पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, इसलिए यह प्रस्ताव अब भी बातचीत की मेज तक नहीं पहुंचा है।

यूरोप की भूमिका क्या है? रूस का आरोप है कि यूरोप ने यूक्रेन मुद्दे पर बातचीत आगे बढ़ाने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की। यूरोपीय देश इस आरोप को खारिज करते रहे हैं और रूस पर ही गतिरोध का दोष मढ़ते हैं।

स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_34058594

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#पुतिन#g20 शिखर सम्मेलन#रूस यूक्रेन युद्ध#क्रेमलिन#ज़ेलेंस्की#अंतरराष्ट्रीय कूटनीति

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