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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026: नई दिल्ली में शी जिनपिंग का संबोधन और 5 बड़ी पहल

नई दिल्ली में ब्रिक्स नेताओं के 18वें शिखर सम्मेलन के दूसरे सत्र में शी जिनपिंग ने ग्लोबल साउथ की एकजुटता पर जोर दिया और AI, व्यापार व डिजिटल सहयोग की 5 नई पहलें पेश कीं।

नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स नेताओं के 18वें शिखर सम्मेलन के दूसरे सत्र में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का संबोधन इस बात का संकेत है कि वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) अब केवल एक भौगोलिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक संगठित राजनीतिक-आर्थिक शक्ति बन रहा है। जब दुनिया भू-राजनीतिक अस्थिरता, व्यापार विवादों और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रही है, तब ब्रिक्स का यह विस्तारित स्वरूप — जिसे अब "बड़ा ब्रिक्स" कहा जा रहा है — अंतरराष्ट्रीय शासन व्यवस्था में संतुलन की नई मांग पेश करता है। भारत की मेजबानी में हुए इस सम्मेलन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह उस वर्ष हो रहा है जब चीन अपनी 15वीं पंचवर्षीय योजना की शुरुआत कर रहा है।

मुख्य बातें

  • ग्लोबल साउथ की सामूहिक भागीदारी: शी जिनपिंग ने कहा कि विकासशील देशों का समूह अब बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की प्रमुख प्रेरक शक्ति है। उन्होंने ब्रिक्स देशों से अपील की कि वे अंतरराष्ट्रीय मामलों में स्थिर और रचनात्मक भूमिका निभाएं। यह रुख पश्चिमी नेतृत्व वाली व्यवस्था के समानांतर एक वैकल्पिक सहयोग ढांचे की दिशा में संकेत करता है।

  • अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुपक्षवाद: संबोधन में संप्रभुता की समानता, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान जैसे सिद्धांतों पर जोर दिया गया। साथ ही संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं में सुधार की मांग दोहराई गई, ताकि विकासशील देशों की भागीदारी बढ़े।

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ओपन-सोर्स पहल: चीन ने ब्रिक्स देशों के लिए एक समर्पित AI ओपन-सोर्स क्षेत्र बनाने की घोषणा की। इसमें बड़े भाषा मॉडल के विकास, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और खुली तकनीकी परिस्थिति-तंत्र के निर्माण पर सहयोग शामिल है। यह कदम AI शासन में विकासशील देशों की आवाज़ को मजबूत करने की कोशिश है।

  • व्यापार और निवेश सुविधा: विशेष आर्थिक क्षेत्रों के बीच साझेदारी, स्मार्ट पोर्टल और नीतिगत तालमेल का प्रस्ताव रखा गया। अगले वर्ष ब्रिक्स सेवा व्यापार मंच आयोजित करने की योजना भी सामने आई, जिससे आर्थिक सहयोग के नए केंद्र बन सकें।

  • डिजिटल उद्योग सहयोग: डिजिटल उद्योग क्लाउड प्लेटफॉर्म, डिजिटल कौशल प्रशिक्षण और तकनीकी आदान-प्रदान की पहल की गई। इसका उद्देश्य सदस्य देशों की डिजिटल अर्थव्यवस्था को परस्पर जोड़ना है।

  • स्मार्ट विनिर्माण और इंजीनियरिंग: चीन ने स्मार्ट फैक्ट्रियों के निर्माण, मानक प्रणालियों के विकास और इंजीनियर प्रशिक्षण गठबंधन बनाने का प्रस्ताव दिया। युवा वैज्ञानिकों के लिए एक विशेष आदान-प्रदान कार्यक्रम भी घोषित किया गया।

  • चीन की अपनी विकास रणनीति: शी जिनपिंग ने कहा कि चीन की 15वीं पंचवर्षीय योजना केवल घरेलू खाका नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग की सूची भी है। इसमें उच्च गुणवत्ता विकास, खुली अर्थव्यवस्था और बेल्ट एंड रोड परियोजना के उच्चस्तरीय विस्तार पर बल दिया गया।

  • व्यापक अंतरराष्ट्रीय भागीदारी: रूस, दक्षिण अफ्रीका, ईरान, मिस्र, इंडोनेशिया, इथियोपिया, संयुक्त अरब अमीरात और ब्राजील-सऊदी अरब के प्रतिनिधियों के अलावा संयुक्त राष्ट्र महासचिव भी उपस्थित रहे। मेजबानी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की, जो इस समूह के भीतर भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका को दर्शाता है।

  • गहन विश्लेषण

    इस सम्मेलन को केवल एक नियमित वार्षिक बैठक मानना भूल होगी। ब्रिक्स का विस्तार पहले ही पश्चिमी प्रभुत्व वाली वित्तीय संरचनाओं के विकल्प की मांग को स्पष्ट कर चुका है, और अब चीन उस मांग को तकनीकी व व्यापारिक एजेंडे से जोड़ रहा है। AI ओपन-सोर्स क्षेत्र और डिजिटल क्लाउड प्लेटफॉर्म जैसी पहलें दिखाती हैं कि तकनीकी संप्रभुता अब कूटनीति का अभिन्न हिस्सा बन गई है। यदि ये पहलें जमीन पर उतरती हैं, तो विकासशील देशों को सस्ती और सुलभ तकनीक मिल सकती है, जिससे वैश्विक AI शासन में उनकी भागीदारी बढ़ेगी।

    दूसरी ओर, व्यापार सुविधा और विशेष आर्थिक क्षेत्रों की साझेदारी का प्रस्ताव भारत जैसे सदस्यों के लिए दोधारी तलवार है। एक तरफ यह निवेश और रोजगार के अवसर खोल सकता है, दूसरी तरफ सदस्य देशों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा और चीन की व्यापारिक प्रभुत्व को लेकर चिंताएं भी बनी रह सकती हैं। भारत की मेजबानी में यह संतुलन बनाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली खुद ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनने की दावेदार है।

    संयुक्त राष्ट्र सुधार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संरचना में बदलाव की मांग लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन अब इसे ब्रिक्स के विस्तारित मंच से नई ऊर्जा मिल रही है। फिर भी सबसे बड़ी चुनौती वादों को ठोस परियोजनाओं में बदलना है। अगर ब्रिक्स देश आपसी विश्वास, पारदर्शिता और समान लाभ के सिद्धांतों पर आगे बढ़ते हैं, तो यह समूह आने वाले दशक में वैश्विक आर्थिक शासन का एक स्थायी स्तंभ बन सकता है।

    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    प्रश्न: ब्रिक्स में "ग्लोबल साउथ" शब्द का क्या अर्थ है?

    उत्तर: ग्लोबल साउथ से तात्पर्य एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों से है, जो ऐतिहासिक रूप से वैश्विक निर्णय प्रक्रियाओं में कम प्रतिनिधित्व रखते थे। ब्रिक्स इन देशों की सामूहिक आवाज़ को मंच देने का दावा करता है।

    प्रश्न: चीन की 5 नई पहलें भारत जैसे देशों के लिए क्यों मायने रखती हैं?

    उत्तर: ये पहलें AI, डिजिटल बुनियादी ढांचे, व्यापार और कौशल विकास से जुड़ी हैं, जो भारत की तकनीकी और औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं से सीधे जुड़ती हैं। सहयोग से लागत घट सकती है और बाजार तक पहुंच बढ़ सकती है।

    प्रश्न: क्या ब्रिक्स संयुक्त राष्ट्र का विकल्प बन सकता है?

    उत्तर: नहीं, ब्रिक्स संयुक्त राष्ट्र का विकल्प नहीं बल्कि उसके सुधार का पक्षधर है। इसका जोर बहुपक्षवाद को मजबूत करने और विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने पर है।

    स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_34061035

    स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_34061035

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    #ब्रिक्स 2026#शी जिनपिंग#ग्लोबल साउथ#नई दिल्ली शिखर सम्मेलन#एआई सहयोग#अंतरराष्ट्रीय व्यापार

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