तालिबान के 5 साल: GDP बढ़ी, लेकिन आम अफगानों की जिंदगी मुश्किल
तालिबान सरकार के 5 साल पूरे: GDP में मामूली बढ़त के बावजूद बेरोजगारी, महंगाई और गरीबी से जूझते अफगानिस्तान। जानिए असली तस्वीर और भविष्य की चुनौतियां।
स्रोत: thepaper.cn
पांच साल पहले, 7 सितंबर 2021 को, तालिबान ने अफगानिस्तान में अंतरिम सरकार बनाने की घोषणा की थी, और वादा किया था 'स्थायी शांति, समृद्धि और विकास' की। आज, सतही तौर पर काबुल की सड़कों पर नई इमारतें उठती दिखती हैं, टैक्सियों की संख्या बढ़ी है, लेकिन इस चमक-दमक के पीछे आम अफगानों की जिंदगी और मुश्किल हो गई है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े बताते हैं कि देश की तीन-चौथाई आबादी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पा रही है। यह विरोधाभास क्यों है? आइए, इस रिपोर्ट के जरिए समझते हैं असली तस्वीर।

मुख्य बिंदु
- GDP में मामूली बढ़त, लेकिन प्रति व्यक्ति आय में गिरावट: विश्व बैंक की मई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान की GDP में करीब 4.8% की बढ़त दर्ज की गई, मुख्यतः निजी खपत और गैर-कृषि गतिविधियों के कारण। हालांकि, लगातार सूखे, भूकंप, विदेशी सहायता में भारी कटौती और लाखों शरणार्थियों की वापसी के चलते, प्रति व्यक्ति वास्तविक GDP में 5.6% की गिरावट आई है।
- बेरोजगारी की मार: अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, 2025 में अफगानिस्तान में बेरोजगारी दर 13.35% रही, जो वैश्विक स्तर पर काफी ऊंची है। अफगानिस्तान के आर्थिक मामलों के प्रवक्ता के अनुसार, कामकाजी उम्र की 49% आबादी में से 26% बेरोजगार हैं। विदेशी सहायता बंद होने से यह आंकड़ा और बढ़ रहा है।
- महंगाई से बेहाल आम जनता: पाकिस्तान के साथ सीमा विवाद के बाद से आयात बाधित हुआ है, जिससे कीमतों में 40% तक की वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए, हेरात में 10 किलो चावल की कीमत 22 डॉलर से बढ़कर 39 डॉलर हो गई। 2026 में मुद्रास्फीति दर 7.6% तक पहुंच गई, जो 2025 में 3.6% थी।
- शरणार्थियों की वापसी से दबाव: 2025 में लगभग 320,000 अफगान शरणार्थी ईरान और पाकिस्तान से लौटे। इनमें से कई बिना किसी संपत्ति और दस्तावेजों के हैं। इससे आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और भोजन की व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ा है, साथ ही रोजगार की प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है।
- विदेशी सहायता में भारी कटौती: 2001-2021 के बीच अफगानिस्तान को सालाना 4 अरब डॉलर से अधिक की सहायता मिलती थी, जो 2019 में सार्वजनिक खर्च का 75% थी। अब यह लगभग बंद हो चुकी है। 2026 में मानवीय सहायता के लिए केवल 269 मिलियन डॉलर जुटाए जा सके, जबकि जरूरत 1.44 अरब डॉलर थी।
- वित्तीय प्रतिबंध और जमी हुई संपत्ति: अमेरिका ने तालिबान पर प्रतिबंध लगाए हैं और अफगानिस्तान के केंद्रीय बैंक की लगभग 9.5 अरब डॉलर की विदेशी संपत्ति फ्रीज कर दी है, जिससे देश की आयात-निर्यात क्षमता और मुद्रा स्थिरता प्रभावित हुई है।
- सीमा विवाद से व्यापार ठप: पाकिस्तान के साथ सीमा संघर्ष के कारण प्रमुख व्यापारिक मार्ग बंद हैं, जिससे अफगानिस्तान को रोजाना लगभग 25 लाख डॉलर का नुकसान हो रहा है। इससे दवाओं, कृषि उत्पादों और अन्य जरूरी वस्तुओं की कमी हो गई है।

गहन विश्लेषण
तालिबान सरकार के पांच सालों में आर्थिक आंकड़े भले ही सुधार दिखाएं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत है। GDP में वृद्धि मुख्यतः निजी खपत और कुछ खनन परियोजनाओं के कारण हुई है, जबकि इसका लाभ आम लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। पूर्व वित्त उप-मंत्री गुल मसूद साबित के अनुसार, GDP सिर्फ कुल आकार बताती है, यह नहीं कि धन किसके पास जा रहा है। भ्रष्टाचार, अक्षम प्रशासन और महिलाओं पर प्रतिबंधों ने निवेश और विकास को बुरी तरह प्रभावित किया है।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था विदेशी सहायता पर निर्भर थी, जो अब सूख गई है। पश्चिमी देशों ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है, और न ही विकास सहायता बहाल की है। इसके अलावा, केंद्रीय बैंक की संपत्ति फ्रीज होने से देश की मुद्रा स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। नतीजतन, अधिकांश व्यापार अनौपचारिक 'हवाला' नेटवर्क के जरिए होता है, जिससे सरकार को राजस्व नहीं मिलता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
भविष्य की ओर देखें तो, अगर तालिबान महिलाओं की शिक्षा और रोजगार पर प्रतिबंध नहीं हटाता, कानूनी सुधार नहीं करता, और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से जुड़ने का रास्ता नहीं खोजता, तो मौजूदा बुनियादी ढांचा परियोजनाएं और अल्पकालिक आर्थिक वृद्धि सतत विकास में नहीं बदल सकतीं। साथ ही, पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारना और व्यापारिक मार्गों को विविधता देना भी जरूरी है, ताकि अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाया जा सके।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. क्या तालिबान सरकार के तहत अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था सुधर रही है?
आंकड़ों में GDP की बढ़त दिखती है, लेकिन यह भ्रामक है। प्रति व्यक्ति आय घटी है, बेरोजगारी बढ़ी है, और आम लोगों की क्रय शक्ति कम हुई है। विदेशी सहायता बंद होने और प्रतिबंधों के कारण दीर्घकालिक सुधार की संभावना कम है।
2. अफगानिस्तान की मुद्रास्फीति इतनी अधिक क्यों है?
मुख्य कारण आयातित वस्तुओं पर निर्भरता है। पाकिस्तान के साथ सीमा बंद होने से आपूर्ति बाधित हुई है, जिससे खाद्य पदार्थों और दवाओं की कीमतें आसमान छू रही हैं। ईरान-इज़राइल संघर्ष ने भी व्यापारिक मार्गों को प्रभावित किया है।
3. क्या महिलाओं के अधिकारों पर प्रतिबंध का अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है?
बिल्कुल। महिलाओं को काम करने और शिक्षा से वंचित करने से देश की आधी आबादी की क्षमता बेकार पड़ी है। इससे न सिर्फ परिवारों की आय घटी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेश भी नहीं आ पा रहा है, क्योंकि विदेशी कंपनियां तालिबान की नीतियों से सहमत नहीं हैं।


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