G20 बैठक में 'अमेरिका फर्स्ट' की छाया: संयुक्त वक्तव्य क्यों नहीं बन पाया?
अमेरिका की मेजबानी में हुई G20 वित्त मंत्रियों की बैठक में संयुक्त वक्तव्य पर सहमति नहीं बन पाई। जानें कैसे 'अमेरिका फर्स्ट' नीति ने बहुपक्षवाद को कमजोर किया और किन मुद्दों पर खड़ी हुईं असहमतियां।
सितंबर 2026 में अमेरिका के एशविले शहर में हुई G20 वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों की बैठक का परिणाम कुछ ऐसा रहा जिसने वैश्विक आर्थिक सहयोग की बुनियाद को हिला कर रख दिया। यह बैठक मियामी में होने वाले G20 शिखर सम्मेलन से पहले की सबसे महत्वपूर्ण तैयारी बैठक थी, लेकिन इसका अंत आम सहमति से जारी होने वाले संयुक्त वक्तव्य के बिना हुआ। अमेरिका ने अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाते हुए ऐसे विवादास्पद मुद्दों को शामिल किया, जिन पर किसी भी तरह की सहमति नहीं बन पाई। आइए समझते हैं कि आखिर किन वजहों से यह बैठक बहुपक्षवाद की कसौटी पर खरी नहीं उतर पाई और 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति ने किस तरह वैश्विक आर्थिक सहयोग को प्रभावित किया।
मुख्य मुद्दे: जिन पर बनी असहमति
- होर्मुज़ जलडमरूमध्य का मुद्दा: अमेरिकी ड्राफ्ट में होर्मुज़ जलडमरूमध्य में नेविगेशन की आज़ादी पर चिंता जताई गई, लेकिन इसमें जिम्मेदारी तय करने का तरीका ऐसा था जो अमेरिका को दोषी ठहराने से बचाता था। दरअसल, इस क्षेत्र में तनाव की जड़ ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध और सैन्य कार्रवाई है, जिसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
- 'वैश्विक असंतुलन' पर एकतरफा रुख: अमेरिकी ड्राफ्ट में 'गैर-बाजार नीतियों' और 'अत्यधिक निर्यात निर्भरता' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके चीन को निशाना बनाया गया। यह उसकी 'चीनी क्षमता अधिशेष' वाली पुरानी बहस का हिस्सा था, जबकि G20 के बहुपक्षीय मंच पर इस बात पर सहमति थी कि असंतुलन को ठीक करने के लिए अधिशेष और घाटे वाले दोनों देशों को मिलकर काम करना होगा।
- IMF के अधिकार क्षेत्र का विस्तार: अमेरिका चाहता था कि IMF चीन की 'गैर-बाजार नीतियों' पर डेटा इकट्ठा करे, जबकि IMF के नियमों के मुताबिक उसे किसी देश की आंतरिक आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन करने का अधिकार नहीं है। यह साफ तौर पर IMF के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात थी।
- कर्ज पुनर्गठन में भेदभावपूर्ण रवैया: अमेरिकी ड्राफ्ट में आधिकारिक द्विपक्षीय लेनदारों की भूमिका पर ज़ोर दिया गया, जबकि G20 का सिद्धांत 'तुलनीय व्यवहार' का है, यानी सभी लेनदारों (आधिकारिक, निजी, बहुपक्षीय) को आनुपातिक योगदान देना चाहिए। अमेरिका का यह रुख एक बार फिर चीन को निशाने पर लेने जैसा था, क्योंकि चीन कर्ज राहत में सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा है।
- अमेरिकी अधिकारी का बयान: अमेरिकी वित्त विभाग की अंतरराष्ट्रीय मामलों की उप सचिव एरिन ब्राउन ने साफ कहा कि वे एक ऐसा बयान चाहते थे जो 'अमेरिकी हितों' और 'अमेरिका फर्स्ट' की प्राथमिकताओं को दर्शाए। इस बयान ने साफ कर दिया कि अमेरिका बहुपक्षवाद की भावना के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रख रहा है।
गहराई से विश्लेषण
यह घटना वैश्विक आर्थिक शासन में बढ़ते एकतरफावाद का एक और उदाहरण है। अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति को आगे बढ़ाया है, चाहे वह व्यापार युद्ध हो या जलवायु परिवर्तन समझौते से हटना। G20 जैसे मंच, जो 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सहयोग का प्रतीक बने थे, अब महाशक्तियों के बीच टकराव का अखाड़ा बनते जा रहे हैं।
इस बैठक में अमेरिका ने जिन मुद्दों को उठाया, वे महज आर्थिक नहीं हैं, बल्कि भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित हैं। चीन पर 'गैर-बाजार नीतियों' का आरोप लगाना और IMF को अपने पक्ष में करने की कोशिश करना, यह दर्शाता है कि अमेरिका चीन की बढ़ती आर्थिक ताकत को रोकने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की रणनीति उल्टी पड़ सकती है, क्योंकि वैश्विक समस्याओं जैसे कर्ज संकट या जलवायु परिवर्तन का समाधान अकेले कोई देश नहीं कर सकता।
भविष्य में, G20 की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि सभी देश बहुपक्षवाद के सिद्धांतों का पालन करें और आम सहमति बनाने की कोशिश करें। अगर अमेरिका इसी तरह एकतरफा रुख अपनाता रहा, तो G20 जैसे मंचों की प्रासंगिकता खत्म हो सकती है, और वैश्विक आर्थिक शासन कमजोर होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
G20 की बैठक में संयुक्त वक्तव्य क्यों नहीं जारी हो पाया?
मुख्य रूप से अमेरिका द्वारा उठाए गए विवादास्पद मुद्दों पर आम सहमति नहीं बन पाई। अमेरिका चाहता था कि बयान में उसकी प्राथमिकताएं, जैसे चीन पर 'गैर-बाजार नीतियों' का आरोप और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ईरान की भूमिका को उजागर करना, शामिल हों, जिसका कई देशों ने विरोध किया।
'अमेरिका फर्स्ट' नीति का G20 पर क्या असर पड़ा है?
इस नीति ने G20 में बहुपक्षीय सहयोग की भावना को कमजोर किया है। अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखता है, जिससे अन्य देशों, विशेषकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ टकराव बढ़ता है। इससे G20 जैसे मंचों पर आम सहमति बनाना मुश्किल हो जाता है।
क्या इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा?
हां, इसका असर वैश्विक आर्थिक सहयोग पर पड़ सकता है। जब बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आपसी सहमति से काम नहीं करेंगी, तो वैश्विक वित्तीय स्थिरता, कर्ज संकट और व्यापार जैसे मुद्दों पर समाधान निकालना मुश्किल होगा। इससे आर्थिक अनिश्चितता बढ़ सकती है।
स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_34028280
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