संयुक्त राष्ट्र में अफ्रीका के नक्शे पर विवाद: अमेरिका का विरोध
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मर्केटर प्रोजेक्शन को बदलने का प्रस्ताव पारित किया, जिसमें अफ्रीका का आकार छोटा दिखता है। अमेरिका ने अकेले विरोध किया। जानिए इस फैसले के पीछे की राजनीति और इसका वैश्विक प्रभाव।
स्रोत: thepaper.cn
क्या आप जानते हैं कि आज हम जिस दुनिया के नक्शे को देखते हैं, वह अफ्रीका को उसके वास्तविक आकार से काफी छोटा दिखाता है? यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब इस मुद्दे ने संयुक्त राष्ट्र तक का रुख किया है। 4 सितंबर 2026 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें स्कूलों, सरकारों और तकनीकी कंपनियों से मर्केटर प्रोजेक्शन (Mercator projection) के बजाय 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' (Equal Earth projection) अपनाने का आग्रह किया गया है। इस प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने वोट दिया, जबकि अकेले अमेरिका ने विरोध में वोट डाला। यह विवाद सिर्फ नक्शे का नहीं, बल्कि उपनिवेशवाद, 'संज्ञानात्मक न्याय' और वैश्विक शक्ति संतुलन की कहानी है। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
मुख्य बिंदु
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प्रस्ताव का उद्देश्य: संयुक्त राष्ट्र का यह प्रस्ताव मर्केटर प्रोजेक्शन के इस्तेमाल को हतोत्साहित करता है, क्योंकि यह अफ्रीका और भूमध्य रेखा के पास के देशों को छोटा दिखाता है। 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' 2018 में विकसित किया गया था, जो महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को सही तरीके से प्रदर्शित करता है।
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प्रस्ताव किसने रखा: यह प्रस्ताव टोगो (Togo) ने अफ्रीकी समूह की ओर से पेश किया, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के 54 अफ्रीकी सदस्य देश शामिल हैं। अफ्रीकी संघ (African Union) ने भी इसका समर्थन किया।
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वोटिंग का परिणाम: 164 देशों ने पक्ष में, 1 ने विरोध में (अमेरिका) और 6 ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। यह प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हुआ, जो दर्शाता है कि अफ्रीकी देशों को इस मुद्दे पर व्यापक समर्थन मिला।
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अमेरिका का विरोध: अमेरिका ने इस प्रस्ताव को 'विचारधारात्मक एजेंडा' बताया और कहा कि संयुक्त राष्ट्र को 16वीं सदी के नक्शे के बजाय वास्तविक अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। अमेरिकी प्रतिनिधि ने इसे संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता गिरने का कारण बताया।
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फ्रांस का समर्थन: फ्रांस ने प्रस्ताव का समर्थन किया और घोषणा की कि वह मर्केटर प्रोजेक्शन का उपयोग बंद कर देगा। फ्रांसीसी विदेश मंत्री ने कहा कि नक्शा बदलने से दुनिया नहीं बदलेगी, लेकिन विकृत प्रस्तुति को सुधारना सत्य की रक्षा है।
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ऐतिहासिक संदर्भ: मर्केटर प्रोजेक्शन 1569 में गेरार्डस मर्केटर (Gerardus Mercator) ने नेविगेशन के लिए बनाया था। यह दिशा बनाए रखने में मदद करता है, लेकिन क्षेत्रफल को विकृत करता है। इसके कारण ग्रीनलैंड अफ्रीका से बड़ा दिखता है, जबकि वास्तव में अफ्रीका ग्रीनलैंड से 14 गुना बड़ा है।
प्रस्ताव का महत्व: यह प्रस्ताव सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि यह अफ्रीका के प्रति ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करने और 'संज्ञानात्मक न्याय' (cognitive justice) की दिशा में एक कदम है।
गहन विश्लेषण
यह प्रस्ताव सतह पर भले ही नक्शे के बारे में हो, लेकिन इसके पीछे की राजनीति गहरी है। मर्केटर प्रोजेक्शन ने सदियों से उत्तरी गोलार्ध के देशों, खासकर यूरोप और अमेरिका को दुनिया में बड़ा और महत्वपूर्ण दिखाया है। यह कोई संयोग नहीं है कि यह प्रोजेक्शन उस दौर में लोकप्रिय हुआ जब यूरोपीय शक्तियां उपनिवेश बना रही थीं। नक्शे ने उनके साम्राज्यवादी दृष्टिकोण को मजबूत किया। अब जब अफ्रीकी देश इस चुनौती दे रहे हैं, तो यह सिर्फ एक तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि उपनिवेशवाद के मानसिक प्रभाव से मुक्ति की लड़ाई है। अमेरिका का विरोध इसलिए भी है क्योंकि 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' में अमेरिका और यूरोप छोटे दिखते हैं, जो उनकी वैश्विक छवि को चुनौती देता है। फ्रांस का समर्थन भी दिलचस्प है, क्योंकि वह अफ्रीका के साथ अपने संबंधों को सुधारने की कोशिश कर रहा है, खासकर उन देशों के साथ जो कभी उसके उपनिवेश थे। यह प्रस्ताव भविष्य में शिक्षा, मीडिया और मानचित्रण सॉफ्टवेयर में बदलाव ला सकता है, जिससे लोगों की दुनिया को देखने का नजरिया बदलेगा। हालांकि, यह बदलाव तुरंत नहीं होगा, क्योंकि मर्केटर प्रोजेक्शन अभी भी कई जगहों पर मानक है, लेकिन यह प्रस्ताव एक महत्वपूर्ण संकेत है कि अफ्रीकी देश अपनी आवाज उठा रहे हैं और दुनिया को उनकी बात सुननी पड़ रही है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यह प्रस्ताव भारत के लिए क्यों मायने रखता है?
भारत भी एक उष्णकटिबंधीय देश है, जो मर्केटर प्रोजेक्शन में छोटा दिखता है। यह प्रस्ताव भारत जैसे विकासशील देशों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह वैश्विक नक्शे में उनके वास्तविक आकार और महत्व को उजागर करता है।
क्या इस प्रस्ताव से नक्शे तुरंत बदल जाएंगे?
नहीं, यह प्रस्ताव सिर्फ एक सिफारिश है। स्कूलों, सरकारों और कंपनियों को इसे अपनाने में समय लग सकता है। लेकिन यह एक वैश्विक मानसिकता बदलाव की शुरुआत हो सकती है।
अमेरिका ने अकेले विरोध क्यों किया?
अमेरिका ने इसे 'विचारधारात्मक एजेंडा' बताया और कहा कि संयुक्त राष्ट्र को वास्तविक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि असली कारण यह है कि नए नक्शे में अमेरिका का आकार छोटा दिखता है, जो उसकी वैश्विक शक्ति की छवि को कमजोर कर सकता है।

स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_34014084
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