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अलीबाबा ने P-ग्रेडिंग क्यों हटाई? 'हाई-पी' कर्मचारियों का सच

अलीबाबा ने 19 साल पुरानी P-ग्रेडिंग प्रणाली हटाकर नई व्यवस्था लाई। जानिए कैसे भारी पदानुक्रम कंपनियों को खोखला बनाता है और आपकी कंपनी क्या सीख सकती है।

जुलाई 2023 में अलीबाबा के ई-कॉमर्स यूनिट टाओटियन ने वह कदम उठाया जिसने हर बड़ी कंपनी के HR विभाग को चुप करा दिया — लगभग दो दशकों से चली आ रही P-ग्रेडिंग प्रणाली को जड़ से हटा दिया गया। यह कोई मामूली फेरबदल नहीं था। P4 से P8 तक के स्तरों को 14 से 28 तक के नए स्तरों में बदल दिया गया, और 28 के ऊपर कोई पदानुक्रम ही नहीं बचा। सवाल यह है कि क्या यह केवल अलीबाबा की आंतरिक समस्या है, या यह हर उस कंपनी के लिए आईना है जहाँ पद बढ़ते रहते हैं पर काम नहीं होता?

कंपनी में भारी पदानुक्रम की समस्या

मुख्य बातें

  • P-प्रणाली की शुरुआत अच्छे इरादे से हुई थी। 2004 में अलीबाबा के B2B व्यवसाय ने इसे इसलिए बनाया ताकि तकनीकी कर्मचारी प्रबंधक बने बिना भी आगे बढ़ सकें। P6 को विशेषज्ञ, P7 को सीनियर विशेषज्ञ और P8 को वरिष्ठ विशेषज्ञ माना जाता था। लेकिन 19 साल में यह प्रणाली अपना ही एजेंडा बना बैठी।

  • पद ने काम को निगल लिया। रिपोर्टिंग संस्कृति ऐसी बनी कि P7 प्रस्तुति बनाता, P8 उसे जाँचता और P9 उसमें सुधार करता। असली काम P6 करता रहा, पर श्रेय ऊपर के स्तरों को मिलता गया। जो व्यक्ति ज़मीन पर काम कर रहा था, वही सबसे निचले पद पर था।

  • प्रमोशन ही एकमात्र लक्ष्य बन गया। हर छह महीने में समीक्षा और हर साल प्रमोशन की दौड़ में कर्मचारी प्रस्तुति सजाने में महीनों लगाने लगे। प्रदर्शन स्कोर सिकुड़कर केवल 3.7, 3.5 और 3.25 रह गए — स्कोर जितने सरल, राजनीति उतनी जटिल।

  • पद ने सोच को जकड़ लिया। एक P8 कर्मचारी P6 का काम करने को तैयार नहीं होता, भले ही वह कंपनी के लिए सबसे ज़रूरी हो, क्योंकि उसे लगता है कि उसकी "कीमत" गिर जाएगी। नतीजा — निर्णय लेने वाले बहुत, लागू करने वाले कम।

  • P8 से ऊपर का दायरा पूरी तरह बदल गया। सुधार के बाद P8 से ऊपर के कर्मचारी संगठनात्मक नियुक्ति पर चले गए, जहाँ वेतन और बोनस अब पद से नहीं, बल्कि व्यवसाय के आकार और टीम के दायरे से जुड़ गए।

  • बाज़ार ने तुरंत मूल्यांकन बदल दिया। एक पूर्व P8 कर्मचारी, जिसकी वार्षिक आय लगभग 13 लाख युआन थी, सुधार के बाद नौकरी खोजते समय केवल 7 लाख युआन का प्रस्ताव पा सका। यह दिखाता है कि पद का तमगा हटते ही बाज़ार में कीमत लगभग आधी रह जाती है।

  • तीन चीज़ें सीधे खत्म हुईं। पहला — पहचान का अहंकार ("यह मेरा काम नहीं" कहने की गुंजाइश खत्म)। दूसरा — प्रमोशन की बेचैनी, क्योंकि 28 के ऊपर कोई सीढ़ी ही नहीं बची। तीसरा — आंतरिक तुलना, क्योंकि अब यह नहीं देखा जाता कि कौन ऊँचे पद पर है, बल्कि यह कि कौन उस व्यवसाय का ज़िम्मेदार है।

पदानुक्रम और निर्णय की गति

गहन विश्लेषण

अलीबाबा का यह कदम सिर्फ़ एक कंपनी की आंतरिक सफ़ाई नहीं है, बल्कि बड़े संगठनों की उस पुरानी बीमारी का इलाज है जिसे अक्सर गलती से "बड़ी कंपनी की बीमारी" कह दिया जाता है। सच यह है कि यह बीमारी कंपनी के आकार से नहीं, बल्कि पदानुक्रम की परतों से जन्म लेती है। पचास कर्मचारियों वाली कंपनी में भी उपाध्यक्ष, निदेशक, प्रबंधक और कार्यकारी — पाँच स्तर बन सकते हैं, और एक निर्णय के लिए तीन हस्ताक्षर और चार बैठकें लग सकती हैं। जो कंपनियाँ सबसे तेज़ी से बढ़ती हैं, उनमें आमतौर पर परतें बहुत कम होती हैं और मालिक सीधे ज़मीनी कर्मचारी से बात कर सकता है।

अलीबाबा की नई व्यवस्था का सबसे क्रांतिकारी पहलू यह है कि उसने पद और वेतन के बीच की जकड़न तोड़ दी। जब तक वेतन पद से तय होता है, तब तक हर कर्मचारी की नज़र सीढ़ी पर रहेगी, न कि ग्राहक पर। जब वेतन व्यवसाय के आकार से जुड़ जाता है, तो बड़ी टीम चलाने वाले वरिष्ठ अधिकारी को भी परिणाम दिखाना पड़ता है। उद्योग के जानकारों की सार्वजनिक प्रतिक्रिया भी यही संकेत देती है — यह बदलाव मध्य और निचले स्तर के कर्मचारियों को अधिक प्रेरित करता है और "सामूहिक भोज" वाली संस्कृति को रोकता है, जिसमें सब बराबर हिस्सा लेते हैं पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं उठाता।

भारत के संदर्भ में यह सबक और भी प्रासंगिक है। तेज़ी से बढ़ते स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र में कई कंपनियाँ जल्दी ही "निदेशक" और "उपाध्यक्ष" की उपाधियाँ बाँटने लगती हैं, जबकि असली काम करने वालों की संख्या स्थिर रहती है। परिणाम यह होता है कि निर्णय धीमे पड़ जाते हैं, प्रतिभाशाली लोग थककर चले जाते हैं, और बीच में परतों की भीड़ बस अपनी उपयोगिता साबित करने में लगी रहती है। अलीबाबा का प्रयोग बताता है कि समाधान संगठन चार्ट को सजाने में नहीं, बल्कि सत्ता को वापस व्यवसाय के पास लाने में है।

आगे का जोखिम यह है कि कोई भी सुधार अपने आप में पूर्ण नहीं होता। नई व्यवस्था में भी अगर व्यवसाय के आकार का मापन ईमानदार नहीं रहा, तो नई परतें फिर उग आएँगी। असली परीक्षा यह होगी कि क्या कंपनी लगातार उन लोगों को पुरस्कृत कर पाती है जो वास्तव में मूल्य बनाते हैं, चाहे उनका पद छोटा हो।

टीम और ज़िम्मेदारी का संतुलन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या पदानुक्रम पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए? नहीं। पूरी तरह पदानुक्रम हटाना भी नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि इससे जवाबदेही और करियर पथ अस्पष्ट हो जाते हैं। असली ज़रूरत अनावश्यक परतों को हटाने की है — ख़ासकर उन बिचौलिए स्तरों की, जो केवल निर्णय को धीमा करते हैं और मूल्य नहीं जोड़ते।

अगर मेरी कंपनी छोटी है तो क्या यह समस्या लागू नहीं होती? बिल्कुल लागू होती है। पदानुक्रम की बीमारी कंपनी के आकार की मोहताज नहीं है। पचास लोगों की कंपनी में भी पाँच स्तर की रिपोर्टिंग बन सकती है। जो छोटी कंपनियाँ तेज़ी से बढ़ती हैं, उनमें आमतौर पर परतें कम और निर्णय तेज़ होते हैं।

प्रमोशन की जगह कर्मचारियों को क्या देना चाहिए? प्रमोशन के बजाय परियोजना आधारित ज़िम्मेदारी और तत्काल पुरस्कार देना अधिक प्रभावी है। जो व्यक्ति किसी महत्वपूर्ण परियोजना में अहम भूमिका निभाए, उसे सीधे पैसा और अधिकार मिलना चाहिए, बिना प्रमोशन विंडो का इंतज़ार किए। कंपनी की वृद्धि प्रमोशन से नहीं, परियोजनाओं से होती है।

संगठन में बदलाव की दिशा

स्रोत URL: https://mp.weixin.qq.com/s/DeJRxWbk2JlFa__Z149mBA

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#अलीबाबा#पदानुक्रम#कॉर्पोरेट संस्कृति#प्रमोशन प्रणाली#स्टार्टअप प्रबंधन#कर्मचारी उत्पादकता

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