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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: शी जिनपिंग नई दिल्ली पहुंचे, भारत-चीन संबंधों में नई शुरुआत

ब्रिक्स नेताओं के 18वें शिखर सम्मेलन के लिए शी जिनपिंग नई दिल्ली पहुंचे। जानिए इस यात्रा का महत्व, भारत-चीन संबंधों पर असर और वैश्विक भू-राजनीति में ब्रिक्स की भूमिका।

स्रोत: thepaper.cn

12 सितंबर 2026 की दोपहर को जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का विमान नई दिल्ली के पालम वायुसेना अड्डे पर उतरा, तो यह सिर्फ एक और कूटनीतिक यात्रा नहीं थी। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर वे ब्रिक्स नेताओं के 18वें शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने आए हैं। यह वह पल है जब दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादी वाले देश एक मंच पर मिलते हैं, और वैश्विक दक्षिण की राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ता है।

मुख्य बातें

  • ऐतिहासिक स्वागत: नई दिल्ली के पालम वायुसेना अड्डे पर भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने शी जिनपिंग का गर्मजोशी से स्वागत किया। लाल कालीन के दोनों ओर सम्मान-सैनिकों की टुकड़ियों ने औपचारिक सलामी दी, जो इस यात्रा के प्रोटोकॉल-स्तर के महत्व को दर्शाता है।

  • उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल: राष्ट्रपति शी के साथ चीन के शीर्ष नेतृत्व में शामिल कैई ची और वांग यी भी उसी विमान से पहुंचे। भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने भी हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी की, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रतिनिधिमंडल में राजनीतिक और कूटनीतिक दोनों धाराएं शामिल हैं।

  • प्रवासी समुदाय की भागीदारी: हवाई अड्डे से होटल जाते समय सड़क के किनारे भारतीय चीनी समुदाय और चीनी कंपनियों के प्रतिनिधियों ने दोनों देशों के झंडे लहराकर उनका स्वागत किया। यह दृश्य द्विपक्षीय संबंधों के जन-स्तरीय आयाम को उजागर करता है।

  • ब्रिक्स का 18वां संस्करण: यह शिखर सम्मेलन ब्रिक्स के विस्तार के बाद के दौर में हो रहा है, जब समूह में नए सदस्य देश जुड़ चुके हैं। इससे इस मंच का एजेंडा पहले से कहीं अधिक व्यापक और जटिल हो गया है।

  • मेजबानी का प्रतीकात्मक महत्व: भारत की मेजबानी यह संकेत देती है कि नई दिल्ली बहुपक्षीय मंचों पर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व की भूमिका को मजबूत करना चाहती है।

  • द्विपक्षीय बैठक की संभावना: शिखर सम्मेलन के इतर शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री मोदी के बीच द्विपक्षीय वार्ता की उम्मीद है, जिसमें सीमा विवाद, व्यापार घाटा और तकनीकी सहयोग जैसे मुद्दे उठ सकते हैं।

  • वैश्विक संदर्भ: यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था में तनाव, जलवायु संकट और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की मांग तेज हो रही है। ब्रिक्स इन मुद्दों पर विकासशील देशों की आवाज बनने का दावा करता है।

गहन विश्लेषण

इस यात्रा को केवल एक प्रोटोकॉल-आधारित घटना मानना भूल होगी। भारत और चीन के संबंध पिछले कुछ वर्षों में सीमा तनाव और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के कारण ठंडे रहे हैं, लेकिन ब्रिक्स जैसा मंच दोनों को एक साझा मंच पर लाता है जहां टकराव से ज्यादा सहयोग की गुंजाइश है। चीन के लिए यह यात्रा वैश्विक दक्षिण में अपनी साझेदारी को मजबूत करने और पश्चिमी दबावों के बीच वैकल्पिक गठजोड़ बनाने का अवसर है। भारत के लिए यह संतुलन की कला दिखाने का मौका है — एक ओर अमेरिका और पश्चिम के साथ रणनीतिक साझेदारी, दूसरी ओर ब्रिक्स में सक्रिय भागीदारी।

व्यापार के नजरिए से देखें तो भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ा है, और नई दिल्ली इस मुद्दे को हर द्विपक्षीय वार्ता में उठाती रही है। ऐसे में शिखर सम्मेलन के दौरान निवेश, आपूर्ति श्रृंखला और तकनीक हस्तांतरण पर चर्चा होना स्वाभाविक है। ब्रिक्स के विस्तार के बाद समूह की आर्थिक शक्ति बढ़ी है, लेकिन सदस्यों के बीच हितों का टकराव भी बढ़ा है — यही इस सम्मेलन की सबसे बड़ी चुनौती है।

भविष्य की दिशा पर नजर डालें तो दो संभावनाएं दिखती हैं। पहली, भारत-चीन संबंधों में धीमी लेकिन स्थिर सामान्यीकरण की प्रक्रिया, जिसमें ब्रिक्स एक जरूरी सेतु की भूमिका निभाएगा। दूसरी, वैश्विक दक्षिण के भीतर नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा, जहां भारत और चीन दोनों अपनी-अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश करेंगे। किसी भी स्थिति में, यह शिखर सम्मेलन एशिया की भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रिक्स क्या है और इसका महत्व क्यों बढ़ रहा है? ब्रिक्स ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का समूह है, जिसमें अब कई नए देश भी शामिल हो चुके हैं। यह विकासशील देशों को पश्चिमी-नेतृत्व वाली वित्तीय व्यवस्था का विकल्प देने और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की मांग को आवाज देने का मंच बन गया है।

क्या इस यात्रा से भारत-चीन संबंधों में तुरंत सुधार होगा? तुरंत बड़े बदलाव की उम्मीद कम है, क्योंकि सीमा विवाद और व्यापार असंतुलन जैसे गहरे मुद्दे बने हुए हैं। लेकिन नियमित उच्च-स्तरीय संवाद बहाल होना दीर्घकालिक स्थिरता की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।

भारत के लिए ब्रिक्स और पश्चिमी गठबंधन में संतुलन कैसे संभव है? भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देता है और किसी एक खेमे में बंधना नहीं चाहता। ब्रिक्स में सक्रियता और क्वाड जैसे मंचों में भागीदारी दोनों को साथ लेकर चलना नई दिल्ली की बहु-संरेखण नीति का हिस्सा है।

स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_34057328

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#ब्रिक्स शिखर सम्मेलन#शी जिनपिंग#भारत चीन संबंध#नई दिल्ली#वैश्विक दक्षिण#कूटनीति

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