ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026: नई दिल्ली में 'बड़े ब्रिक्स सहयोग' की नई दिशा
ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में शुरू। जानिए कैसे ब्रिक्स वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बनकर विश्व व्यवस्था बदल रहा है और भारत-चीन की भूमिका क्या है।
ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित हो रहा है। यह ऐसा समय है जब वैश्विक व्यवस्था तेज़ी से बदल रही है और उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अपनी नई पहचान बना रही हैं। भारत की मेज़बानी में हो रही इस बैठक में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल हो रहे हैं, जो इसे और भी महत्वपूर्ण बनाता है। सवाल यह है कि एक आर्थिक अवधारणा से शुरू हुआ ब्रिक्स आज वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र कैसे बन गया?

मुख्य बातें
- वैश्विक जनसंख्या और अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी: ब्रिक्स देशों की आबादी दुनिया की लगभग आधी है, आर्थिक उत्पादन का करीब 30 प्रतिशत और व्यापार का पाँचवाँ हिस्सा इनके पास है। यह आँकड़े बताते हैं कि ब्रिक्स अब केवल एक मंच नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्तंभ है।
- नई दिल्ली की मेज़बानी का महत्व: भारत पहली बार इस विस्तारित स्वरूप में शिखर सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा है। यह भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं और ग्लोबल साउथ में उसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
- 'ब्रिक्स प्लस' का विस्तार: 2017 में शुरू हुआ 'ब्रिक्स प्लस' मॉडल अब 50 से अधिक देशों तक पहुँच चुका है। इसका उद्देश्य किसी गुटबाजी में शामिल होना नहीं, बल्कि शांति और विकास का व्यापक ढाँचा बनाना है।
- न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका: ब्रिक्स के न्यू डेवलपमेंट बैंक ने अब तक 42 अरब डॉलर से अधिक के ऋण स्वीकृत किए हैं। यह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में उभरती शक्ति और ग्लोबल साउथ सहयोग का प्रतीक बन गया है।
- औद्योगिक और डिजिटल सहयोग: नई औद्योगिक क्रांति साझेदारी के तहत औद्योगीकरण, डिजिटलीकरण और नवाचार में सहयोग बढ़ रहा है। डिजिटल शिक्षा सहयोग पहल और क्षमता निर्माण कार्यक्रम इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- संघर्षों पर साझा रुख: ब्रिक्स ने फिलिस्तीन-इज़राइल मुद्दे पर विशेष वीडियो शिखर बैठक की और यूक्रेन संकट पर शांतिपूर्ण समाधान की पहल को 110 से अधिक देशों का समर्थन मिला। यह दर्शाता है कि ब्रिक्स वैश्विक मुद्दों पर एकजुट आवाज़ बन रहा है।
- सांस्कृतिक और थिंक टैंक जुड़ाव: 'ग्लोबल साउथ' थिंक टैंक सहयोग गठबंधन और डिजिटल शिक्षा पहल जैसे कदम लोगों के बीच आपसी समझ बढ़ा रहे हैं। यह सहयोग को केवल सरकारी स्तर तक सीमित नहीं रहने देता।
- सुशासन और बहुध्रुवीयता: 'ब्रिक्स प्लस' के विस्तार से वैश्विक स्तर पर समान और समावेशी बहुध्रुवीयता को बल मिल रहा है। इससे आर्थिक वैश्वीकरण का ऐसा स्वरूप बन रहा है जो विकासशील देशों के हितों को केंद्र में रखता है।
गहन विश्लेषण
ब्रिक्स की यात्रा को समझने के लिए दो दृष्टिकोण ज़रूरी हैं। पहला, वैश्विक व्यवस्था में बदलाव का ऐतिहासिक संदर्भ, और दूसरा, सदस्य देशों के स्वयं के विकास का अनुभव। जब 2001 में 'ब्रिक' शब्द एक निवेश बैंक की रिपोर्ट में पहली बार आया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह अवधारणा एक राजनीतिक-आर्थिक मंच बन जाएगी। आज यह मंच पश्चिमी नेतृत्व वाली संस्थाओं के विकल्प के रूप में उभर रहा है, जहाँ विकासशील देश अपनी शर्तों पर विकास की राह तय करना चाहते हैं।
भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन दोहरी चुनौती और अवसर लेकर आया है। एक ओर भारत चीन के साथ सीमा विवाद जैसे मुद्दों पर सतर्क है, दूसरी ओर वह ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करना चाहता है। नई दिल्ली में मेज़बानी भारत को यह मौका देती है कि वह ब्रिक्स के भीतर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता को प्रदर्शित करे। यही कारण है कि भारत ब्रिक्स को चीन-नियंत्रित मंच नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय सहयोग का ज़रिया बनाना चाहता है।
आर्थिक पक्ष पर नज़र डालें तो ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है। ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के अलावा मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के जुड़ने से यह समूह ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और तकनीक के क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। लेकिन यही विविधता चुनौती भी है, क्योंकि सदस्यों के हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं होते।
आगे का रास्ता सहयोग को संस्थागत बनाने में है। न्यू डेवलपमेंट बैंक, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था जैसे कदम डॉलर पर निर्भरता घटा सकते हैं। अगर ब्रिक्स अपने वादों को ज़मीन पर उतार पाए, तो अगले दो दशकों में वैश्विक शासन व्यवस्था का चेहरा बदल सकता है। भारत और चीन का सहयोग इस दिशा में निर्णायक साबित होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ब्रिक्स में भारत की भूमिका क्या है? भारत ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है और ग्लोबल साउथ की आवाज़ को मंच पर पहुँचाने में सक्रिय है। नई दिल्ली में शिखर सम्मेलन की मेज़बानी से भारत की कूटनीतिक साख और बढ़ेगी।
क्या ब्रिक्स पश्चिम विरोधी गठबंधन है? नहीं, ब्रिक्स खुद को किसी गुट का हिस्सा नहीं मानता। इसका ज़ोर सहयोग, विकास और बहुध्रुवीयता पर है, न कि किसी देश के खिलाफ मोर्चा बनाने पर।
ब्रिक्स का विस्तार भारत के लिए फायदेमंद है या नुकसानदेह? विस्तार से ब्रिक्स की वैश्विक पहुँच बढ़ी है, जिससे भारत को नए बाज़ार और साझेदार मिले हैं। हालाँकि भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि समूह के फैसलों में उसकी रणनीतिक स्वायत्तता बनी रहे।
स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_34056450
स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_34056450
संबंधित लेख
यिबिन बलात्कार मामला: पुलिस समीक्षा में 'अपराध हुआ' माना गया
सिचुआन के जुनलियान में एक महिला ने सरकारी कर्मचारी पर बलात्कार का आरोप लगाया। पहले मामला खारिज हुआ, फिर यिबिन पुलिस ने समीक्षा में अपराध की पुष्टि की।

यमन में हूती विद्रोहियों का कब्ज़ा: पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें और बढ़ने का खतरा
यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के अहम बंदरगाह पर कब्ज़ा कर लिया है। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति और भारत में पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

एलन मस्क पर अलेक्स गिब्नी की डॉक्युमेंट्री: सच या शो?
अलेक्स गिब्नी की नई डॉक्युमेंट्री 'मस्क' एलन मस्क के जीवन, विरोधाभासों और विवादों की पड़ताल करती है। जानिए क्यों यह फिल्म चर्चा में है।