ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: मध्य पूर्व और रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच चीन की अपेक्षाएँ
चीन ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले मध्य पूर्व और रूस-यूक्रेन संघर्ष के राजनीतिक समाधान की अपेक्षा जताई। जानिए भारत के लिए इसके क्या मायने हैं।
स्रोत: thepaper.cn
मध्य पूर्व और रूस-यूक्रेन संघर्ष की छाया में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की तैयारियाँ चल रही हैं, और इस बार सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यह समूह वैश्विक संकटों पर क्या ठोस रुख अपनाता है। 11 सितंबर 2026 को चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने नियमित संवाददाता सम्मेलन में कहा कि चीन साझा, व्यापक, सहयोगात्मक और सतत सुरक्षा की अवधारणा का समर्थन करता है तथा विवादों के राजनीतिक समाधान के लिए प्रतिबद्ध है। यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत जैसे उभरते देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मार्ग और कूटनीतिक संतुलन पहले से कहीं अधिक अहम हो गए हैं।
मुख्य बातें
- चीन की आधिकारिक प्राथमिकता स्पष्ट है: प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि चीन ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर बातचीत और वार्ता के जरिए विवादों को सुलझाने तथा क्षेत्रीय व वैश्विक शांति बनाए रखने की कोशिश करेगा। यह रुख पिछले कुछ वर्षों की चीनी कूटनीति की निरंतरता दर्शाता है।
- पृष्ठभूमि दोहरी संकट की है: शिखर सम्मेलन ऐसे वक्त में हो रहा है जब मध्य पूर्व में तनाव बना हुआ है और रूस-यूक्रेन युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा। इन दोनों मोर्चों ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, खाद्य और ऊर्जा कीमतों पर दबाव बढ़ाया है।
- भारतीय मीडिया की सक्रियता: इस मुद्दे पर सवाल भारतीय समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के संवाददाता ने उठाया, जो यह दिखाता है कि भारत में ब्रिक्स के एजेंडे को लेकर गहरी दिलचस्पी है। भारत ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है और उसकी स्थिति निर्णायक मानी जाती है।
- राजनीतिक समाधान पर जोर: चीन ने सैन्य समाधान के बजाय कूटनीतिक रास्ते पर जोर दिया। यह रुख उन देशों के लिए राहत भरा है जो संघर्षों के विस्तार से बचना चाहते हैं।
- ब्रिक्स का बढ़ता दायरा: ब्रिक्स में नए सदस्यों के जुड़ने के बाद समूह की वैश्विक भूमिका और विविधता दोनों बढ़ी हैं। इससे सहमति बनाना कठिन हुआ है, लेकिन प्रभाव भी बढ़ा है।
- आर्थिक एजेंडा पीछे नहीं: आधिकारिक बयान सुरक्षा पर केंद्रित रहा, पर विश्लेषक मानते हैं कि व्यापार, स्थानीय मुद्रा में भुगतान और विकास सहयोग भी चर्चा में रहेंगे।
- भारत के लिए संतुलन की चुनौती: भारत रूस और पश्चिम दोनों के साथ संबंध बनाए रखता है, इसलिए ब्रिक्स में उसकी भूमिका नाजुक संतुलन की मांग करती है।
गहन विश्लेषण
चीन का यह बयान सतही तौर पर सामान्य कूटनीतिक भाषा लगता है, लेकिन इसके पीछे एक रणनीतिक गणना है। ब्रिक्स को चीन पश्चिमी नेतृत्व वाली व्यवस्था के विकल्प के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है, और ऐसे में मध्य पूर्व तथा यूक्रेन जैसे संघर्षों पर "बातचीत से समाधान" का नारा उसे तटस्थ शांति-निर्माता के रूप में पेश करता है। यह छवि विकासशील देशों के बीच चीन की स्वीकार्यता बढ़ाती है और अमेरिका तथा यूरोप के प्रभाव को चुनौती देती है।
दूसरी ओर, भारत के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार है। भारत ऊर्जा के लिए रूस पर निर्भर है, मध्य पूर्व में उसके लाखों नागरिक काम करते हैं, और पश्चिम के साथ उसका तकनीकी व रक्षा सहयोग भी गहरा है। ऐसे में ब्रिक्स के किसी भी बयान पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा। अगर समूह का रुख बहुत कड़ा हुआ तो भारत के लिए पश्चिम से दूरी बनाना मुश्किल हो जाएगा, और अगर बयान बहुत नरम रहा तो समूह की प्रासंगिकता पर सवाल उठेंगे।
व्यापक स्तर पर देखें तो ब्रिक्स का विस्तार उसकी ताकत और कमजोरी दोनों है। नए सदस्यों ने वैश्विक दक्षिण की आवाज को मंच दिया है, पर हितों की विविधता के कारण संयुक्त निर्णय लेना जटिल हो गया है। मध्य पूर्व और यूक्रेन पर एक साझा, स्पष्ट और क्रियान्वयन योग्य रोडमैप के बिना यह शिखर सम्मेलन केवल घोषणाओं तक सीमित रह सकता है।
आगे की संभावना यह है कि ब्रिक्स मानवीय सहायता, युद्धविराम की अपील और संवाद तंत्र जैसे कम विवादास्पद मुद्दों पर सहमति बनाएगा, जबकि प्रतिबंधों और सैन्य सहयोग जैसे संवेदनशील विषयों पर मतभेद बने रहेंगे। भारत के लिए अवसर यह है कि वह विकासशील देशों के एजेंडे में अपनी प्राथमिकताएँ — ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और दक्षिण-दक्षिण सहयोग — शामिल कराए। चीन के लिए यह मंच अपनी वैश्विक भूमिका को संस्थागत रूप देने का जरिया है। इस प्रकार यह शिखर सम्मेलन केवल संघर्षों पर प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा तय करने वाला अवसर भी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ब्रिक्स क्या है और इसमें कौन-कौन देश शामिल हैं? ब्रिक्स ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुआ एक समूह है, जिसमें बाद में कई नए सदस्य जुड़े। इसका उद्देश्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के हितों को वैश्विक मंच पर आवाज देना और आर्थिक सहयोग बढ़ाना है।
चीन का "साझा सुरक्षा" का नारा क्या दर्शाता है? यह अवधारणा कहती है कि किसी एक देश की सुरक्षा दूसरों की असुरक्षा पर नहीं टिकनी चाहिए। चीन इसे पश्चिमी गठबंधन-आधारित सुरक्षा मॉडल के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है, हालांकि आलोचक इसे रणनीतिक हितों का औजार भी मानते हैं।
भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन क्यों मायने रखता है? भारत ऊर्जा आयात, प्रवासी नागरिकों और व्यापार मार्गों के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर है, इसलिए वहाँ स्थिरता उसके हित में है। साथ ही ब्रिक्स में सक्रिय भूमिका भारत को वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व दिलाने में मदद करती है।
स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_34050198
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