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नेपाल की जलवायु मुआवज़ा मांग पर चीन का जवाब: 'हरित विकास के प्रति प्रतिबद्ध'

नेपाल में आई बाढ़ के बाद अमेरिका, भारत और चीन से जलवायु मुआवज़े की मांग उठी। चीन ने कहा कि वह हरित विकास का समर्थक है और वैश्विक जलवायु शासन में सहयोग को तैयार है। जानिए पूरा मामला।

नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणामों को उजागर किया है। इस आपदा के बाद नेपाल के कुछ वर्गों ने दुनिया के सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों—अमेरिका, भारत और चीन—से जलवायु मुआवज़े की मांग की है। यह मांग ऐसे समय में आई है जब जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं बढ़ रही हैं। चीन ने इस मुद्दे पर अपनी स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उसने खुद को हरित विकास का 'दृढ़ समर्थक' बताया है और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आह्वान किया है। आइए जानते हैं कि चीन का यह रुख क्या संकेत देता है और आगे क्या हो सकता है।

मुख्य बातें

  • चीन का जवाब: विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है, जिसका सामना सभी को मिलकर करना होगा। उन्होंने दोहराया कि चीन हमेशा से हरित विकास का सक्रिय समर्थक और महत्वपूर्ण योगदानकर्ता रहा है।
  • चीन की उपलब्धियां: चीन ने अपने 'डुअल कार्बन' लक्ष्यों (कार्बन पीक और कार्बन न्यूट्रैलिटी) को लागू करने की बात कही और दावा किया कि वह दुनिया में कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता में सबसे बड़ी कमी लाएगा।
  • विकासशील देशों के प्रति समर्थन: चीन ने कहा कि वह विकासशील देशों के वैध अधिकारों की रक्षा करता है और 'साउथ-साउथ कोऑपरेशन' के तहत दूसरे विकासशील देशों को मदद देता है।
  • नेपाल से रिश्ते: चीन ने नेपाल को 'पहाड़ों और नदियों से जुड़ा पड़ोसी' बताया और कहा कि चीन भी इस आपदा से प्रभावित है, क्योंकि यह एक सीमा पार आपदा है।
  • सहयोग का आह्वान: चीन ने नेपाल समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को रोकने और कम करने के लिए काम करने की इच्छा जताई।
  • संदर्भ: यह घटना ऐसे समय में हुई है जब जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विकसित और विकासशील देशों के बीच तनाव बढ़ रहा है।

गहन विश्लेषण

चीन का यह बयान कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहली बात, यह दर्शाता है कि चीन जलवायु मुआवज़े की मांग को सीधे तौर पर खारिज नहीं कर रहा है, बल्कि उसने अपनी भूमिका को रेखांकित करते हुए सहयोग का रास्ता निकाला है। दूसरी बात, 'साउथ-साउथ कोऑपरेशन' का जिक्र करके चीन ने विकासशील देशों के बीच अपनी छवि मजबूत करने की कोशिश की है, क्योंकि वह खुद को उनका साथी बताता है। तीसरी बात, चीन ने यह स्पष्ट किया है कि वह भी इस आपदा से प्रभावित है, जिससे वह 'पीड़ित' की भूमिका में भी दिखता है। यह एक कूटनीतिक चाल हो सकती है, क्योंकि इससे मुआवज़े की मांग का दबाव कम होता है।

वैश्विक स्तर पर, जलवायु वित्त का मुद्दा लंबे समय से विवादास्पद रहा है। विकसित देशों ने 2020 तक प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर जुटाने का वादा किया था, लेकिन वे इसे पूरा नहीं कर पाए। अब नेपाल जैसे देश आपदा के बाद मुआवज़े की मांग कर रहे हैं, जो 'लॉस एंड डैमेज' फंड की अवधारणा से जुड़ता है। हालांकि, चीन विकसित देशों की श्रेणी में नहीं आता, बल्कि वह खुद को विकासशील देश मानता है, इसलिए उस पर यह दायित्व नहीं बनता। फिर भी, चीन की बढ़ती अर्थव्यवस्था और उत्सर्जन को देखते हुए, उससे अधिक योगदान की उम्मीद की जा सकती है।

भविष्य में, इस तरह की मांगें और तेज हो सकती हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव गंभीर होते जा रहे हैं। चीन को अपनी 'हरित विकास' की नीति को और अधिक ठोस कदमों के साथ दिखाना होगा, ताकि वह अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर सके। साथ ही, नेपाल जैसे देशों के साथ सहयोग बढ़ाना चीन के लिए फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि इससे उसकी छवि एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में मजबूत होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: क्या चीन ने नेपाल को जलवायु मुआवज़ा देने से इनकार कर दिया है?

उत्तर: चीन ने सीधे तौर पर मुआवज़ा देने से इनकार नहीं किया है, बल्कि उसने कहा है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी को मिलकर काम करना चाहिए। उसने अपनी ओर से हरित विकास में योगदान का जिक्र किया और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर दिया।

प्रश्न: 'साउथ-साउथ कोऑपरेशन' क्या है और चीन इसका कैसे उपयोग कर रहा है?

उत्तर: साउथ-साउथ कोऑपरेशन का मतलब विकासशील देशों के बीच आपसी सहयोग है। चीन इसका उपयोग करके विकासशील देशों को तकनीकी और वित्तीय मदद देता है, जिससे वह उनके बीच अपना प्रभाव बढ़ाता है और साथ ही जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अपनी भूमिका को सही ठहराता है।

प्रश्न: क्या नेपाल को मुआवज़ा मिलने की संभावना है?

उत्तर: फिलहाल, मुआवज़ा मिलने की संभावना कम है, क्योंकि इसका कोई ठोस तंत्र नहीं है। हालांकि, 'लॉस एंड डैमेज' फंड के तहत कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन यह अभी शुरुआती चरण में है। चीन और अन्य देशों से सहानुभूति और मदद मिल सकती है, लेकिन कानूनी रूप से बाध्यकारी मुआवज़ा मुश्किल है।

स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_34001841

स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_34001841

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