शंघाई सहयोग संगठन: बहुध्रुवीय विश्व में नई भूमिका
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और वैश्विक शासन सुधार पर जोर दिया। जानें SCO के 25 साल, वैश्विक दक्षिण की भूमिका और भारत के लिए निहितार्थ।
बिश्केक में हुए 'शंघाई सहयोग संगठन+' सम्मेलन ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान खींचा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस मंच से बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और वैश्विक शासन सुधार का आह्वान किया। ऐसे समय में जब भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहे हैं और वैश्विक दक्षिण के देश अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं, यह सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय सहयोग की नई दिशा तय कर सकता है। आइए, इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम के निहितार्थों को समझें।
मुख्य बिंदु
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बहुध्रुवीय विश्व का आह्वान: शी जिनपिंग ने कहा कि दुनिया में बहुध्रुवीयता अपरिहार्य है और यह समय की मांग है। उन्होंने 'समान और व्यवस्थित बहुध्रुवीयता' की वकालत की, जिसमें सभी देशों को समान अधिकार और अवसर मिलें।
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वैश्विक दक्षिण की भूमिका: उन्होंने वैश्विक दक्षिण के देशों को बहुध्रुवीय व्यवस्था का 'महत्वपूर्ण स्तंभ' बताया और कहा कि इन देशों की अंतरराष्ट्रीय मामलों में भागीदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए।
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संयुक्त राष्ट्र की भूमिका: शी ने संयुक्त राष्ट्र की सुधारित और सशक्त भूमिका पर जोर दिया, ताकि यह वैश्विक शासन में अधिक प्रभावी हो सके।
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आर्थिक सहयोग: उन्होंने 'बेल्ट एंड रोड' पहल के माध्यम से यूरेशिया में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने की बात कही, जिससे कई देशों को लाभ हो सकता है।
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सुरक्षा साझेदारी: SCO के सदस्य देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने पर जोर दिया गया, खासकर आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने के लिए।
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जलवायु और प्रौद्योगिकी: शी ने डिजिटल और बौद्धिक अंतर को पाटने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि तकनीकी क्रांति का लाभ सभी देशों तक पहुंचे।
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बैठक में उपस्थिति: सम्मेलन में रूस, भारत, पाकिस्तान, ईरान, कजाकिस्तान समेत कई देशों के नेताओं ने भाग लिया, जो SCO की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है।
गहन विश्लेषण
यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव आ रहा है। अमेरिका के नेतृत्व वाली उदारवादी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं, और चीन-रूस जैसे देश वैकल्पिक मंचों को बढ़ावा दे रहे हैं। SCO, जो पहले मुख्य रूप से सुरक्षा मुद्दों पर केंद्रित था, अब आर्थिक और राजनीतिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण मंच बन गया है।
भारत के लिए, SCO एक दोधारी तलवार है। एक ओर, यह चीन और पाकिस्तान के साथ बातचीत का मौका देता है, वहीं दूसरी ओर, यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर सवाल भी खड़े करता है। हालांकि, भारत ने हमेशा SCO में रचनात्मक भूमिका निभाई है, खासकर आतंकवाद और क्षेत्रीय स्थिरता के मुद्दों पर।
वैश्विक दक्षिण का उदय एक वास्तविकता है, और SCO इसका एक प्रमुख प्रतिनिधि बनकर उभरा है। चीन और रूस की पहल पर ग्लोबल साउथ को एकजुट करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन इन देशों के अपने-अपने हित भी हैं। उदाहरण के लिए, भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, या पाकिस्तान और भारत के बीच तनाव, SCO की एकता को चुनौती देते हैं।
भविष्य में, SCO की भूमिका और बढ़ सकती है, खासकर अगर यह वैश्विक शासन सुधार में ठोस योगदान दे सके। हालांकि, यह तभी संभव है जब सदस्य देश आपसी मतभेदों को दूर कर साझा लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) क्या है?
SCO एक अंतर-सरकारी संगठन है, जिसकी स्थापना 2001 में चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान द्वारा की गई थी। बाद में भारत, पाकिस्तान, ईरान और बेलारूस जैसे देश भी शामिल हुए। यह सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देता है।
'शंघाई स्पिरिट' क्या है?
'शंघाई स्पिरिट' SCO का मार्गदर्शक सिद्धांत है, जो आपसी विश्वास, पारस्परिक लाभ, समानता, परामर्श, सम्मान और साझा विकास पर जोर देता है। यह शीत युद्ध कालीन गठबंधनों से अलग, एक नए प्रकार के अंतरराष्ट्रीय संबंधों को बढ़ावा देता है।
SCO का भारत के लिए क्या महत्व है?
भारत के लिए SCO महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मध्य एशिया और चीन के साथ आर्थिक और ऊर्जा सहयोग के अवसर प्रदान करता है। साथ ही, यह आतंकवाद से निपटने में सूचना साझा करने का मंच भी है। हालांकि, भारत को चीन और पाकिस्तान के साथ संबंधों को संतुलित करने की चुनौती का सामना करना पड़ता है।
स्रोत URL: https://www.thepaper.cn/newsDetail_forward_33983461
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